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श्रीरामचरितमानस में श्रीभरतजी के चरित्र का निरूपण

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श्रीमाताजी व श्रीअरविन्द के आलोक में विवेचन

Pages: 88

ISBN: 978-81-954706-2-4

Description

तुलसीदासजी द्वारा श्रीरामचरितमानस में भरतजी के चरित्र के निरूपण के एक क्रमिक विकास – व्यक्तिगत विक्षोभ से सच्ची भक्ति तक – के दृष्टिकोण से विवेचन

तुलसीदासजी द्वारा भरतजी के चरित्र का जो भाव-प्रधान निरूपण किया गया है उसे एक क्रमिक विकास – व्यक्तिगत विक्षोभ से सच्ची भक्ति तक – के दृष्टिकोण से देखा जा सकता है। यह क्रमिक विकास भरतजी के उस व्यक्तिगत विक्षोभ से आरंभ होता है, जो राम-वनवास के घटनाक्रम में उनके अपने मन में व उनके प्रति अयोध्यावासियों के मन में उपजे अपराध बोध और उनके (भरत जी के) मन में अपने आराध्य और प्रिय श्रीराम से चौदह वर्ष के लंबे समय की भौतिक दूरी की संभावना व उससे भी अनन्त गुना अधिक उक्त सारे घटनाक्रम में श्रीरामजी के हृदय में उनके प्रति दूरी पैदा होने की संभावना से होने वाली घोर पीड़ा से उपजा था। अतः येन-केन-प्रकारेण उनको वन से वापस लाकर अयोध्या के राज-सिंहासन पर विराजमान करना ही उन्हें स्वयं की व समस्त अयोध्यावासियों की इस महान् त्रास से मुक्ति का एकमात्र साधन प्रतीत होता है। चित्रकूट में श्रीरामजी से भेंट के उपरांत – उनके हृदय में अपने प्रति एेसा प्रेम देखकर जो उन्हें (श्रीरामजी के) अपने पिता के वचनों का पालन करने की प्रतिज्ञा को त्यागकर उनकी (भरतजी की) इच्छा के अनुरूप ही सब कुछ करने को तैयार कर लेता है – उनके मन व आत्मा की समस्त पीड़ा शांत हो जाती है। अब उनका हृदय मुक्त होकर – अपनी गहराइयों में सदा ही विराजमान – उनकी रामजी के प्रति सच्ची व अनन्य भक्ति को प्रकट कर पाता है। तुलसीदासजी के हाथों से भरतजी का संपूर्ण जीवन प्रेम और भक्ति का एेसा प्रकाश-स्तम्भ बन जाता है, जो युगों-युगों से मानवता को मार्ग दिखाता आ रहा है। इस यात्रा में हमें मुख्यतः पाँच चरण परिलक्षित होते हैं –

1. भरतजी द्वारा श्रीराम-वनवास के सारे प्रकरण में अपनी पूर्ण असंलिप्तता सिद्ध करने के प्रयास

2. रामजी के विरह-रूपी घोर संताप से अपनी और प्रजाजनों की मुक्ति हेतु भरतजी का संकल्प व इस संदर्भ में रामजी के प्रति उनके प्रेम के भावों के प्रवाह में प्रजाजनों के मन से भी उनके प्रति अपराध-बोध के बचे-खुचे अंकुरों का पूर्ण उन्मूलन

3. अवध के प्रजाजनों के साथ श्रीरामजी की ओर गमन करते हुए भरतजी के मन में उठने वाली शंकाएँ व दुविधाएँ, तथा श्रीरामजी के निश्छल प्रेम सरोवर में स्नान करने से उनके हृदय की समस्त पीड़ाओं का शमन

4. भरतजी में सच्ची भक्ति का उदय

5. सच्ची भक्ति का सत्ता के सभी भागों में संचार – अवलंब की आवश्यकता

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