श्रीअरविन्द और श्रीमाँ तथा स्वामी विवेकानन्द की रचनाओं से कुछ प्रेरणादायक और प्रकाशप्रद वचन

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विषय सूची
1. मानव अभीप्सा
II. परम सद्वस्तु की प्रकृति
III. सामूहिकता, मानवजाति, भारत
IV. वैयक्तिक पूर्णता
V. भागवत कार्यकर्ता, सेवक, दास

‘‘दिव्य जीवन की ओर आरोहण ही मानव यात्रा है, कर्मों का ‘कर्म’ और स्वीकार्य ‘यज्ञ’ है। यही जगत् में मनुष्य का एकमात्र वास्तविक कार्य तथा उसके अस्तित्व का औचित्य है, जिसके बिना वह इस भौतिक ब्रह्माण्ड की भयंकर विशालताओं के बीच सतही कीचड़ व पानी के संयोग से अपने-आप बने एक छोटे-से कण – पृथ्वी – पर अन्य क्षणभंगुर कीटों के बीच मात्र एक रेंगता हुआ कीट-मात्र ही रहेगा।’’ (CWSA 21: 48)
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‘‘अपने प्रबुद्ध विचारों में मनुष्य की सबसे प्रारंभिक तन्मयता और, प्रतीत होता है कि, जो उसकी अपरिहार्य और चरम तन्मयता भी है, – क्योंकि वह संशयवाद की अधिकतम लंबी अवधियों से गुजरकर भी बनी रहती है और प्रत्येक निष्कासन के बाद भी फिर लौट कर आ जाती है, – वही वह उच्चतम तन्मयता भी है जिसकी कि उसका विचार परिकल्पना कर सकता है। वह (तन्मयता) अपने आप को ईश्वर की पूर्वाभासी खोज, पूर्णत्व की ओर उत्प्रेरण, शुद्ध सत्य और अमिश्रित आनंद की खोज, एक गुप्त अमरत्व के आभास के रूप में अभिव्यक्त करती है। मानव ज्ञान की प्राचीन उषाओं ने इस सतत अभीप्सा के विषय में अपनी साक्षी छोड़ी है; आज हम प्रकृति की बाह्यताओं के सफल विश्लेषण से अघा चुकी पर तो भी संतुष्ट नहीं हुई मानवजाति को देखते हैं जो अपनी मौलिक उत्कंठाओं की ओर लौटने की तैयारी कर रही है। प्रज्ञा का सबसे आरंभिक सूत्र ही उसका अंतिम सूत्र भी होने का आश्वासन प्रदान करता है – ईश्वर, स्वतंत्रता, प्रकाश और अमरत्व।” (CWSA 21: 3-4)
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‘‘हम सुखी होने के लिए धरती पर नहीं हैं क्योंकि पार्थिव जीवन की वर्तमान स्थितियों में सुख एक असंभवता है। हम धरती पर भगवान् को खोजने और प्राप्त करने के लिए हैं क्योंकि केवल ‘दिव्य चेतना’ ही सच्चा सुख दे सकती है।’’ मार्च १९७२ (CWM 14: 7)
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“सारतः जीने का एकमात्र एक ही सच्चा हेतु है ः वह है अपने-आपको जानना। हम यहाँ पृथ्वी पर हैं – यह सीखने के लिये कि हम क्या हैं, हम यहाँ क्यों हैं, और हमें क्या करना है। और यदि हम यह नहीं जानते, तो हमारा जीवन सर्वथा निःसार है – हमारे अपने लिये भी और दूसरों के लिये भी।” (CWM 6: 15-16)
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“यहाँ तक कि सबसे अधम, मूर्ख से मूर्ख मनुष्य भी ऐसी किसी चीज की खोज करता है जिसमें प्रकृति के नियमों पर शासन करने की शक्ति हो। वह कोई राक्षस, भूत, या कोई देवता देखना चाहता है, ऐसा कुछ देखना चाहता है जो प्रकृति को वश में कर ले, जिसके लिए प्रकृति सर्वशक्तिमान न हो, जिसके लिए कोई नियम न हो। ‘ओह! कोई ऐसा जो नियम भंग कर सकता हो!’ यही पुकार मनुष्य के हृदय से निकल रही है। हम सदा ऐसे किसी व्यक्ति की खोज करते रहते हैं जो नियम को भंग कर दे।” (CWSV 2: 400)
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“यदि मनुष्यजाति को इस बात की केवल झलक-मात्र भी मिल जाए कि कितने अनंत भोग, कितनी सर्वांगपूर्ण शक्तियाँ, सहजलब्ध ज्ञान के कितने ज्योतिर्मय शिखर, हमारी सत्ता की कितनी विशाल शांतियाँ उन प्रदेशों में हमारी प्रतीक्षा कर रही हैं जिन्हें हमारे पाशविक क्रमविकास ने अभी तक नहीं जीता है, तो वह सब कुछ छोड़ देगी और जब तक वह इन संपदाओं को आयत्त नहीं कर लेगी तब तक चैन से नहीं बैठेगी। परन्तु मार्ग संकीर्ण है, द्वारों को खोलना कठिन है और क्षुद्रतर सामान्य क्षेत्रों से हमारे कदमों को दूर हटाने में बाधा देने वाले प्रकृति के प्रहरी भय, अविश्वास तथा संदेह उपस्थित हैं।” (CWSA 12: 423)
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